11/7/2019 7:44:45 PM

नोटबंदी के 3 साल: आर्थिक बदहाली की गलियों में धकेलने वाला फैसला, जिसने तरक्की की रफ्तार पर लगा दिया

आज ही के दिन 3 साल पहले देश को आर्थिक बदहाली के रास्ते पर धकेलने वाली नोटबंदी का ऐलान हुआ था। और नतीजा यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के भाषण के 3 साल बाद देश आज भी इसके कुप्रभावों से संघर्ष कर रहा है। किसानों की फसल की कीमत नहीं निकल पा रही है, कामगारों को नौकरी बचाना मुश्किल है और काम-धंधे चलना-चलाना दूभर है। 2016 नवंबर की 8 तारीख देश के इतिहास का वह दिन है जब देश ने एक गलत दिशा की तरफ कदम बढ़ाए। तीन साल बाद हम सब जानते हैं कि आज हम कहां पहुंच गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मुंह से खुद बोल रहे हैं कि उनके कार्यकाल के पहले 5 साल बरबाद हो गए। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं, वे खुद हैं। कैशलेस अर्थव्यवस्था के उनके जुनून ने अर्थव्यवस्था को ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया कि संभलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। तीन साल पहले के अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि नोटबंदी से कालाधन खत्म हो जाएगा, आतंकवाद का सफाया हो जाएगा और नकली नोट बाहर निकलकर आ जाएंगे। लेकिन हुआ क्या, कालेधन के तो दर्शन ही नहीं हुए, नकली नोट अब भी हमारे-आपके हाथों में आ जाते हैं और आतंकवाद के नाम पर ही तो बीजेपी वोट मांगती रही है। कुल मिलाकर जिन वादों और दावों पर नोटबंदी की गई थी, वह उस सबमें नाकाम साबित हुई है। नोटबंदी का जब ऐलान हुआ था क्या अमीर, क्या गरीब, क्या गांव क्या शहर सबने इसका स्वागत किया। माना गया कि इससे अमीर-गरीब सब एक कतार में आ गए। गरीबों को लग कि उच्च और मध्य वर्ग को औकात दिखा दी गई। लेकिन, तीन साल बाद यही गरीब सबसे ज्यादा दुखी हैं। श्रम ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में मजदूरों की मजदूरी में होने वाली बढ़ोत्तरी में 3.4 फीसदी की कमी हुई है। खेतिहर मजदूरों के लिए महंगाई दर कहीं ज्यादा साबित हो रही है। नोटबंदी से हालात ऐसे आ गए हैं कि बाजार से मांग ही खत्म हो गई है। गांवों में मांग की हालत और भी खराब है। बचत की हालत भी बिगड़ चुकी है। 2011-12 के मुकाबले घरेलू बचत में 30 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है। मांग कम होने का सीधा अर्थ यही है कि लोग कम खर्च कर रहे हैं। और इससे साफ पता चलता है कि देश की मौजूदा आर्थिक हालत देश की आबादी के बड़े हिस्से को कोई फायदा नहीं पहुंचा रही है। यूपीए सरकार के दौर में करीब 14 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आए थे और मध्य वर्ग में शामिल हुए थे। लेकिन वे वापस उसी दौर में पहुंचने लगे हैं। नतीजा यह है कि उपभोक्ता मांग में बेहद कमी है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर साफ दिख रहा है। विकास दर आंकने के तरीके सरकार ने बदल दिए और इसे 7.6 फीसदी पर दिखा दिया। लेकिन तीन साल बाद एसबीआई का अनुमान ही बताता है कि यह 5 फीसदी से नीचे जा चुकी है। यानी अगर हमें आज से शुरु कर 2024 तक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है तो हर साल कम से कम 8 फीसदी की रफ्तार से तरक्की करनी होगी। नोटबंदी से जो झटका लगा था, उसका असर साफ दिख रहा है। जीएसटी राजस्व एक लाख करोड़ से नीचे आ गया है। दिवाली भी बाजार में रौनक नहीं ला पाई। सिर्फ मारुति में ही 4.5 फीसदी की वृद्धि देखी गई। लेकिन ऑटो सेक्टर की बाकी कंपनियां परेशान हैं। अपनी राजनीतिक विचारधारा और जुड़ाव के बावजूद कारोबारी भी अब बोलने लगे हैं कि आने वाला वक्त और भी मुश्किलों भरा है। बदहाली साफ दिख रही है। कोर सेक्टर की विकास दर 14 साल के बदतर सत्र पर 5.2 फीसदी पर पहुंच गई है। बिजली उत्पादन तक बुरे दौर में है और इसकी विकास दर सितंबर माह में 3.7 फीसदी पर पहुंच चुकी है। ये दोनों संकेतक अर्थव्यवस्था रसातल में पहुंचने का प्रमाण हैं। इस सबके बीच बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या के रूप में हमारे सामने खड़ी है। आंकड़े बताते हैं कि काम करने लायक 10 नागरिकों में से सिर्फ एक को ही काम मिल रहा है। रोज हजारों कामगारों को काम से हटाया डा रहा है। 2011-12 से लेकर 2017-18 के बीच में करीब 90 लाख कामगारों के लिए रोजगार में कमी आई है। सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी की दर शहरों में 8.9 फीसदी और गांवों में 8.3 फीसदी पहुंच चुकी है। बेरोजगारी के मोर्चे पर देश का यह हाल 45 साल पहले था। एक खबर के मुताबिक प्रधानमंत्री ने हाल ही में आईएएस अफसरों की बैठक में कहा, "आपने मेरे पांच साल बरबाद कर दिए. मैं आपको अगले पांच साल बरबाद नहीं करने दूंगा।" शायद प्रधानमंत्री सही कह रहे हैं। लेकिन बस उन्हें इतना करना है कि नोटबंदी जैसे फैसले लेने से बचें। Source - navjeevan