अपनी पार्टी के पसीने छुड़ाने वाले भाजपा नेता की कहानी, जिसके काम को यूनेस्को ने इनाम दिया

अपनी पार्टी के पसीने छुड़ाने वाले भाजपा नेता की कहानी, जिसके काम को यूनेस्को ने इनाम दिया
Published Date:
Saturday, June 30, 2018 - 12:59

राजस्थान में भाजपा के कद्दावर नेता रहे घनश्याम तिवाड़ी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने भारत वाहिनी नाम से अपनी एक पार्टी बना ली है. तिवाड़ी लंबे समय से बागी रुख अपनाए हुए थे. 25 जून को प्रेस से बात करते हुए उन्होंने इस्तीफे का ऐलान किया. क्या है घनश्याम तिवाड़ी की पूरी कहानी, आइए जानते हैं.

6 मई, 2017 को बीजेपी की केंद्रीय अनुशासन समिति ने राजस्थान के सीनियर बीजेपी नेता घनश्याम तिवाड़ी को अनुशासनहीनता की वजह से कारण बताओ नोटिस थमा दिया. उन्हें इसका जवाब देने के लिए दस दिन की मोहलत दी गई थी. इस नोटिस में उनसे पिछले दो सालों में पार्टी विरोधी गतिविधि करने, पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करने और समानांतर संगठन खड़ा करने पर जवाब मांगा गया है. संघ की शाखा से राजनीति में आए तिवाड़ी प्रदेश में बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे हैं. वो अच्छे वक्ता और तेज-तर्रार नेता माने जाते हैं. पिछले तीन साल में कई मौकों पर उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार को सदन में सांसत में डाल डाला है. नोटिस का जवाब उन्होंने आर-पार वाले लहजे में दिया है कि वो राज्य के भ्रष्ट पार्टी नेतृत्व के सामने ना झुकेंगे और ना ही पीछे हटेंगे. तिवाड़ी के जवाब के बाद बीजेपी में फूट के कयास तेज हो गए थे.

तिवाड़ी सूबे की राजनीति में क्यों इतने महत्पूर्ण हैं, आइए बताते हैं

1980 का साल था. राजस्थान के सीकर में सांवली रोड पर दस बीघे जमीन का सौदा होने जा रहा था. थोड़े से मोल-भाव के बाद ये सौदा पट गया. खरीदने वाले का नाम था सीताराम शर्मा और बेचने वाला आदमी था घनश्याम तिवाड़ी. 33 साल का युवा, जिसे आने वाला चुनाव लड़ना था. उसने अपनी पुश्तैनी जमीन सिर्फ इसलिए बेच दी, ताकि वो चुनाव के लिए जरूरी पैसे जुटा सके. पार्टी का नाम था बीजेपी. जनता दल टूटने के बाद नई बनी पार्टी बीजेपी के लिए राज्य में ये पहला चुनाव था. चुनाव हुए और वोटों की गिनती शुरू हुई. हम इस वोटिंग को थोड़ी देर के लिए बीच में रोक देते हैं और पीछे चलते हैं.

सीकर जिले की धोद तहसील में एक गांव है खूड़. 19 दिसम्बर 1947 के दिन घनश्याम तिवाड़ी का जन्म इसी गांव में हुआ. ये उनका ननिहाल था. उनकी मां उनके बचपन में ही चल बसीं. इसलिए अपनी जिंदगी का शुरुआती दौर उन्होंने यहीं गुजारा. थोड़ी उम्र होने के बाद उन्हें पिता के घर शीतला का बास, सीकर लौटना पड़ा. किशोरावस्था में ही उनका संपर्क RSS के साथ हो गया. शाखा से वो विद्यार्थी परिषद में सक्रिय हुए. 1966 से 68 तक सीकर के श्रीकल्याण कॉलेज के तीन बार महासचिव रहे. इसके बाद वो वकालत करने जयपुर चले गए. यहां भी वो छात्र राजनीति में सक्रिय रहे और लॉ कॉलेज के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वो जनसंघ के युवकों के लिए बने संगठन युवा संघ के पहले प्रदेश अध्यक्ष बने.

जब तिवाड़ी के लिए अनशन पर बैठे जेपी

1975 में आपातकाल की घोषणा के बाद घनश्याम तिवाड़ी को डीआईआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. आपातकाल के दौर में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ दो कानूनों का खूब इस्तेमाल किया. पहला था DIR और दूसरा MISA (मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी ऑर्डिनेंस). मीसा और डीआईआर में ये फर्क हुआ करता था कि डीआईआर के तहत मुकदमे चलाए जाते थे और मीसा में बिना किसी सुनवाई के जेल में रखा जाता था.

सभा को संबोधित करते हुए घनश्याम तिवाड़ी

उन्होंने अपने पर डीआईआर के तहत चल रहे केस की पैरवी खुद की और जेल से छूटने में कामयाब रहे. कानूनी रास्ते से आपातकाल के दौरान छूटने वाले वो पहले राजनीतिक बंदी थे. इस बात का देश भर में खूब प्रचार हुआ. इसके बाद वो कुछ समय के लिए भूमिगत हो गए. सीकर से सटे झुंझनू में RSS के कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा था. उस केस की पैरवी करने के लिए तिवाड़ी झुंझनू पहुंचे. उन्हें कोर्ट परिषद से ही उठा लिया जाता है. जिला एसपी के दफ्तर में ले जाकर उन्हें अधमरे होने तक पीटा जाता है और नीम बेहोशी की हालत में उन्हें ट्रेन में बैठा कर सीकर रवाना कर दिया जाता है. जब जेपी को इस घटना की खबर लगती है, तो वो इसके खिलाफ तीन दिन के अनशन पर बैठ जाते हैं. घनश्याम तिवाड़ी अगले दिन के अखबारों की सुर्खियां बन जाते हैं.

टिकट मिला, लेकिन चुनाव नहीं लड़े

जनवरी 1977 में आपातकाल में थोड़ी ढील दी जाती है. जयपुर में जनसंघ की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक होती है. सिर्फ चार लोग इस बैठक में पहुंचते हैं. टोंक के अजीत सिंह, ओम प्रकाश गुप्ता, नागौर से ईश्वर चौधरी और घनश्याम तिवाड़ी. आपातकाल उठता है. जनसंघ का विलय जनता पार्टी में होता है. विधानसभा चुनावों के लिए तिवाड़ी को टिकट दिया जाता है, लेकिन वो चुनाव नहीं लड़ते. तिवाड़ी याद करते हैं

“उस समय मेरी उम्र तीस साल थी. जब वकालत पढ़कर सीकर लौटा था, तो उन्हीं के नीचे काम की शुरुआत की थी. लोगों ने कहा कि मेरी उम्र कम है, इसलिए मदन जी को चुनाव लड़ने दिया जाए. मैंने ये बात मान ली. आज भी मेरे पास वो टिकट पड़ा हुआ है. मैंने मदन जी के पक्ष में खूब मेहनत की, लेकिन हम चुनाव हार गए.”

इस चुनाव में मदन लाल 6021 के अंतराल से कांग्रेस के रणमल सिंह से चुनाव हार गए. हालांकि सूबे का चुनाव जनता पार्टी के पक्ष में गया. पार्टी ने 200 में 152 सीटों पर फतह हासिल की. भैरो सिंह शेखावत सूबे के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. हालांकि वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. 1980 के लोकसभा चुनावों के बाद आई इंदिरा सरकार ने सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

वोटिंग को हमने जहां छोड़ा था, वहीं से फिर शुरू करते हैं. तिवाड़ी के खिलाफ थे कांग्रेस के सोमनाथ त्रेहन और लोक दल के मोहम्मद हुसैन. उन्होंने इस त्रिकोणीय मुकाबले को 3820 वोटों से जीत लिया. 1985 के चुनाव में इसी सीट पर फिर से मुकाबला त्रिकोणीय था. बीजेपी से तिवाड़ी, कांग्रेस के सांवर मल और निर्दलीय प्रत्याशी अब्दुल रज्जाक. तिवाड़ी फिर से जीते लेकिन इस बार जीत का अंतर तीन गुना था. वो 12 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत गए.1989 में राजीव गांधी के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बना. हालांकि बीजेपी इस मोर्चे में शामिल नहीं थी, लेकिन चुनाव के बाद इसे बाहर से समर्थन दे रही थी. हरियाणा के कद्दावर नेता चौधरी देवी लाल रोहतक के अलावा एक और जगह से चुनाव लड़ रहे थे. जगह थी सीकर. सामने थे कद्दावर जाट नेता बलराम जाखड़. देवी लाल लड़े और जीते भी, लेकिन एक कसक उनके मन में रह गई. सीकर के सामाजिक कार्यकर्ता अशफाक कायमखानी इस कसक के बारे में रोचक ब्योरा सुनाते हैं –

“देवी लाल 1990 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में सीकर प्रचार के लिए आए. सीकर की एक सभा में उन्होंने अपनी एक साल पुरानी कसक का बदला ले लिया. उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘घनश्याम का वैसा ही साथ देना जैसा घनश्याम ने मेरा दिया था.’ राजस्थान के सबसे मजबूत जाट बेल्ट में एक जाट नेता का ये इशारा काफी था. दरअसल उन्होंने लोकसभा चुनाव में सीकर की हर विधानसभा में बढ़त दर्ज की थी सिवाए एक के. सीकर शहर, जहां के विधायक थे घनश्याम तिवाड़ी. यहां देवी लाल 20 हजार से ज्यादा वोटों से पिछड़ गए थे. चुनाव के नतीजे आए और कांग्रेस के राजेंद्र पारीक के खिलाफ घनश्याम तिवाड़ी चुनाव हार गए.”

इस चुनाव में धांधली के आरोप लगे और तिवाड़ी मामला लेकर कोर्ट पहुंच गए. वो बताते हैं –

“मैं सीकर से अपने दो ही टर्म काउंट करता हूं. कोर्ट ने धांधली के मामले में मेरी पेटीशन स्वीकार तो कर ली थी, लेकिन बाबरी मस्जिद ढहाने के कारण चार राज्यों की विधानसभा भंग कर दी गई थी. इस वजह से मामले में आगे सुनवाई नहीं हो सकी.”

1993 में फिर से चुनाव हुए. घनश्याम तिवाड़ी ने समझदार नेता होने का सबूत देते हुए अपनी सीट बदल ली. वो इस बार जयपुर की चौमू सीट से चुनाव लड़े और जीते. राजस्थान में पहली मर्तबा बीजेपी की सरकार बनी. 200 में 95 सीट लेकर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. इस सरकार को जनता दल के 6 विधायकों का समर्थन प्राप्त था. भैरो सिंह फिर से सूबे के मुख्यमंत्री बने. अपने कार्यकाल के आखरी चरण में मंत्री मंडल में फेर-बदल कर उन्होंने तिवाड़ी को उर्जा मंत्री बनाया. तिवाड़ी एक साल तक इस पद पर रहे.

1998 के चुनाव में वो फिर से इसी सीट से चुनाव लड़े. सामने थे कांग्रेस के भगवान सहाय सैनी. तिवाड़ी ये चुनाव 46,674 मतों से हार गए. ये उस विधानसभा चुनाव में हार का सबसे बड़ा अंतर था.इस चुनाव में कांग्रेस को नया चेहरा मिल गया था, अशोक गहलोत. कांग्रेस को 153 सीटों पर जीत मिली और सत्ताधारी बीजेपी महज 33 सीटों पर सिमट गई. तिवाड़ी भी कांग्रेस की इसी लहर का शिकार हो गए.

तिवाड़ी ने एक बार फिर से समझदारी दिखाई और सीट बदल ली. वो जयपुर की सांगानेर सीट पर आ गए. यहां से उन्होंने आसान जीत दर्ज की. तत्कालीन वसुंधरा सरकार में उन्हें शिक्षा मंत्री बनाया गया. वो 2003 से लगातार इस सीट पर चुनाव जीतते आए हैं. जो तिवाड़ी 1998 के चुनाव में रिकॉर्ड मतों से हारे थे वही तिवाड़ी 2013 के चुनाव में रिकॉर्ड मतों चुनाव जीते. कुल मतदान का लगभग 66 फीसदी वोट उनके खाते में गया. जीत का अंतर था 65,350.जब घनश्याम तिवाड़ी ने 2013 विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी, तब सबको उम्मीद थी कि तमाम मतभेदों के बावजूद उन्हें मत्रिमंडल में जगह मिलनी तय है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसका नतीजा ये हुआ कि वो पिछले चार साल से वो पार्टी के भीतर विपक्ष का काम कर रहे हैं. वसुंधरा सरकार विपक्ष की बजाए अपनी ही पार्टी के कद्दावर विधायक की वजह से ज्यादा घिरती नजर आईं.

मसलन पिछले विधानसभा सत्र में उन्होंने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री अरुण चतुर्वेदी से सामाजिक सुरक्षा के तहत दी जाने वाली पेंशन पर सवाल किया. मंत्री जी का जवाब अगले दिन अखबारों में छपा और सरकार बैकफुट पर नजर आई. दरअसल सरकार ने 1.78 लाख लोगों की पेंशन बंद कर दी थी. इसकी सफाई में मंत्री जी ने कहा कि इसमें से 1.71 लाख लोग मृत पाए गए हैं. इसके बाद इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया. घनश्याम तिवाड़ी सफाई देते हैं –

“मैं जब इस विधानसभा में पहली बार आया था तो भैरोसिंह शेखावत, परसराम मदेरण और नाथूराम मिर्धा जैसे वरिष्ठ नेता इस सदन का हिस्सा हुआ करते थे. उस समय सिर्फ वोटिंग के दौरान ही पार्टी लाइन का खयाल रखा जाता था. सदन की बहस में सरकार के विधायक भी सरकार से खूब असहमति जताते थे. ये किसी भी लोकतांत्रिक देश की गौरवशाली परम्परा का हिस्सा है. उस समय हमारी बात सुनी जाती थी और जरूरी बातों पर अमल भी होता था. आज-कल इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तौर पर देखा जाने लगा है. हमारे यहां एक कहावत है. चोरा ने चांदकणों सुहावे कोनी मतलब चोरों को चांदनी अच्छी नहीं लगती. बस यही हाल प्रदेश पार्टी नेतृत्व का है.”

ये एक दशक पुरानी अदावत है

दरअसल वसुंधरा राजे और घनश्याम तिवाड़ी की अदावत बहुत पुरानी है. 2003 में जब राजे को प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया गया, तो पार्टी का एक धड़ा इस बात से खुश नहीं था. घनश्याम तिवाड़ी इसी धड़े में थे. हालांकि उस समय वसुंधरा राजे का कद इतना बड़ा भी नहीं था कि प्रदेश के पुराने नेतृत्व को ठिकाने लगा सकें. उन्हें ना चाहते हुए भी महत्वपूर्ण मंत्रालय विरोधी खेमे को देने पड़े. घनश्याम तिवाड़ी को शिक्षा मंत्रालय सौंपा गया. उन्होंने संपूर्ण शिक्षा नाम से माध्यमिक शिक्षा के लिए जोरदार कार्यक्रम चलाया. इस दौरान दूसरे राज्यों से अलग उन्होंने शिक्षकों की स्थाई नियुक्ति शुरू की. इससे कई युवाओं को रोजगार मिला. घनश्याम तिवाड़ी शिक्षा मंत्री के तौर पर किए जा रहे कामों के काफी ख्याति बटोर रहे थे. यूनेस्को ने इस काम के लिए कंफूशियस सम्मान भी दिया था.

8 दिसंबर, 2006 को तत्कालीन राजे सरकार के तीन साल पूरे हुए थे. इस मौके पर प्रदेश में एक कार्यक्रम रखा गया था. घनश्याम तिवाड़ी ने इस कार्यक्रम से अलग अपना एक कार्यक्रम रखा. इसके उद्घाटन के लिए बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से जसवंत सिंह को बुलाया गया. इस कार्यक्रम में तिवाड़ी ने अपने मंत्रालय के काम के संबंध में दो ग्रंथनुमा किताबें दस्तावेज के तौर पर पेश कीं. ये दस्तावेज सरकार द्वारा पेश किए गए कुल दस्तावेजों से ज्यादा थे. इसी कार्यक्रम में उन्होंने घोषणा की कि शिक्षा मंत्रालय गांवों का इतिहास लिखने का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है. इसका नाम “आपणी धरती, आपणा लोग, आपणी खेजड़ी, आपणा फोग.” होगा. वसुंधरा राजे ने इसे सियासी चुनौती के तौर पर लिया.

ये वो दौर था जब केन्द्र में जसवंत सिंह और प्रदेश में ललित किशोर चतुर्वेदी, महावीर प्रसाद जैन, गुलाब चंद कटारिया, घनश्याम तिवाड़ी, रघुवीर सिंह कौशल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी पूरी लॉबी एकाएक वसुंधरा राजे के खिलाफ खड़ी हो गई थी. 2 नवंबर 2007 को बाड़मेर जिले का गांव जसोल राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा. पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह द्वारा आयोजित रियाण कार्यक्रम में अफीम परोसे जाने की खबर हर जगह थी. इसके बाद जोधपुर में उनके खिलाफ इस मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इसमें 9 और लोगों को अभियुक्त बनाया गया. हालांकि रियाण में अफीम परोसी जाती रही है. जसवंत सिंह घिर चुके थे. राज्य में वसुंधरा राजे की सरकार थी और दोनों गुटों में खाई और बढ़ गई.

दूसरे असंतुष्ट नेता गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया हुआ करते थे. गुर्जर आंदोलन के बाद वसुंधरा राजे गृह मंत्रालय का काम खुद देखने लगीं. कटारिया के पास उनके ही विभाग की फाइल जानी बंद हो गईं. वो इससे नाराज चल रहे थे. इसके अलावा कोटा से विधायक मदन दिलावर भी राजे से नाराज थे. वो कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि रखते थे. कोटा में इमानुएल मिशन पर विहिप के लोगों ने हमला कर दिया था. इसमें दिलावर के लोग शामिल थे. दिलावर पर हिंसा के लिए भड़काने के आरोप लगे. इसके बाद राजे ने उनकी खूब खिंचाई की. इस बीच कार्यकाल के अंतिम समय में तिवाड़ी को शिक्षा मंत्री से हटा कर विधि एवं न्याय मंत्रालय और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय थमा दिया गया. इस तरह से 2007 के चुनाव से पहले वसुंधरा राजे ने अपने खिलाफ पार्टी में ही विपक्ष खड़ा कर लिया था.

चुनाव हारने की पटकथा लिखी जा चुकी थी.

2008 में चुनावी हार के बाद भी ये झगड़ा सुलझ नहीं पाया. वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के खिलाफ विरोधी धड़े ने खूब जोर आजमाइश की. अगस्त 2009 में पार्टी की तरफ से उन्हें पद छोड़ने के लिए भी कह दिया गया. इसका जवाब वसुंधरा ने अपने अंदाज में दिया. पार्टी के चालीस से ज्यादा विधायकों के साथ वो दिल्ली शक्ति प्रदर्शन करने पहुंच गईं. इसके बाद शीर्ष नेतृत्व को ये विचार छोड़ देना पड़ा. हालांकि विरोधी खेमे के अरुण चतुर्वेदी को प्रदेश अध्यक्ष पद देकर शक्ति के संतुलन की कोशिश जरूर की गई.

हार के बाद यहां उम्मीद ये की जा रही थी कि पार्टी में कलह शांत होगी, हुआ इसके उलट. 2009 के आम चुनाव में घनश्याम तिवाड़ी को जयपुर शहर सीट से बीजेपी का टिकट मिल गया. यह बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीट थी. 1989 से गिरधारी लाल भार्गव लगातार इस सीट पर जीतते आए थे. तिवाड़ी इस सीट पर कांग्रेस के महेश जोशी के खिलाफ 16 हजार वोटों से चुनाव हार गए. आरोप लगा वसुंधरा लॉबी पर. तिवाड़ी कहते हैं,

“आदर्श नगर विधायक अशोक परनामी और किशनपोल विधायक मोहन लाल गुप्ता वसुंधरा के ख़ास सिपहसलार हैं. उस समय जब सांसद का चुनाव लड़ रहा था तो पूरे जयपुर में इस दो विधानसभाओं में मैं पिछड़ा था. बाद में पता कि इन दोनों ने मेरे खिलाफ जमकर प्रचार किया, ताकि मैं केंद्र की राजनीति में ना जा सकूं.”

एकला चलो रे

ये अदावत 2013 के चुनाव तक भी शांत नहीं हुई. वसुंधरा राजे जब चुनाव से पहले प्रचार के लिए सुराज संकल्प यात्रा निकाल रही थीं, ठीक उसी समय तिवाड़ी भी देव-दर्शन यात्रा निकाल रहे थे. स्थिति ये हो गई कि तिवाड़ी को सांगानेर से टिकट देने के लिए केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा. बड़े बहुमत से सत्ता में लौटीं वसुंधरा ने अपना बदला पूरा किया और सबसे बड़ी जीत दर्ज कर आए तिवाड़ी को मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं मिली. तिवाड़ी ने भी इस चुनौती को स्वीकार किया और एक समानांतर संगठन ‘दीनदयाल वाहिनी’ खड़ा कर लिया. हालांकि ये संगठन अब तक गैर-राजनीतिक है, लेकिन कब तक गैर-राजनीतिक रह पाएगा, इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता.

हालांकि एक दशक पुरानी इस लड़ाई में अब तिवाड़ी अकेले पड़ते दिखाई दे रहे हैं. ललित किशोर चतुर्वेदी और रघुवीर सिंह कौशल का इंतकाल हो चुका है. महावीर प्रसाद जैन चुप्पी साध चुके हैं. जसवंत सिंह बीमार हैं. कैलाश मेघवाल, गुलाब चंद कटारिया, ओंकार लखावत, अरुण चतुर्वेदी चुनाव से पहले ही वसुंधरा खेमे में जा चुके हैं. ऐसे में तिवाड़ी अकेले इस लड़ाई को लड़ते नजर आ रहे हैं. खबरें यह भी हैं कि अंदरखाने कई पार्टी नेताओं का समर्थन उन्हें प्राप्त है.

हाल के अनुशासनहीनता पर आए नोटिस के बारे में घनश्याम तिवाड़ी अपना पक्ष कुछ इस तरह से रखते हैं-

“1948 में जब संघ पर प्रतिबंध लगा था, तब मेरे ताऊ श्री पृथ्वीराज तिवाड़ी गिरफ्तार हुए थे. आपातकाल के दौरान एक स्वयंसेवक होने के नाते मुझे गिरफ्तार किया गया. मेरे बेटे और पोते भी संघ से जुड़े हुए हैं. यह चार पीढ़ी लंबा जुड़ाव है. संघ में आपको अनुशासन जन्मघुट्टी की तरह पिलाया जाता है. ये लोग मुझे अपरोक्ष रूप से कह रहे हैं कि मैं वसुंधरा राजे का नेतृत्व स्वीकार कर लूं. लेकिन मैं ऐसा करने वाला नहीं हूं. संस्कृत में एक श्लोक है, ‘न दैन्यम, न च पलायनम.’ मैं ना तो डरूंगा और ना ही पीछे हटूंगा.” ( ( विनय सुल्तान . लालनटॉप.कॉम )