पारले-जी बिस्कुट के कवर पर नज़र आने वाली बच्ची कौन है

पारले-जी बिस्कुट के कवर पर नज़र आने वाली बच्ची कौन है
Published Date:
Sunday, June 17, 2018 - 12:19

श्वेतांक ( लल्लनटॉप ) हम बचपन के दिनों से पारले-जी बिस्कुट खाते आ रहे हैं. हम क्या, हमारे मम्मी-पापा भी यही खाकर बड़े हुए हैं. समय के साथ बहुत कुछ बदल गया. नहीं बदला तो एक समय में दुनिया का सबसे मशहूर बिस्कुट रहा पारले-जी का पैकेट. हालांकि पारले ने उसके बाद कई सारे प्रोडक्ट मार्केट में उतारे लेकिन उन्होंने ओरिजनल पारले-जी के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं की. इस बिस्कुट के साथ पिछली दो पीढ़ियों की यादें जुड़ी हुई हैं. आज भी इसकी पॉपुलैरिटी में कोई कमी नहीं आई है. 2011 में नील्सन द्वारा किए एक सर्वे के मुताबिक ये दुनिया में सबसे ज़्यादा बिकने वाला बिस्कुट है. हम जब भी इसके कवर को देखते हैं हमारे मन में एक सवाल कौंध जाता है. सवाल ये कि इसके कवर पर नज़र आने वाली बच्ची कौन है? उससे भी जरूरी और बड़ा सवाल ये कि वो आजकल कहां है और क्या रही है? लेकिन हम बिस्कुट खत्म करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं.

इस बिस्कुट के कवर पर दिखने वाली बच्ची को लेकर बहुत कंट्रोवर्सी रही है. इस फोटो वाली बच्ची के लिए तीन महिलाओं के नाम का दावा किया जाता रहा है. मतलब तीन लोगों के बारे में ये कहा जाता रहा है कि वो इस फोटो में दिख रही हैं. इस कंट्रोवर्सी पर विस्तार से बात करेंगे पहले ये जान लें कि ये बच्ची कब से इसके कवर पर दिख रही है.

पार्ले बिस्कुट से पार्ले-जी बनने का कहानी

मुंबई के विले पारले में रहने वाले एक चौहान परिवार ने साल 1929 में ‘पारले’ नाम की एक कंपनी शुरू की. शुरुआत में सिर्फ कंफेक्शनरी मतलब केक, पेस्ट्री और कुकीज़ जैसी चीज़ें बनाकर बेचते थे. लेकिन मार्केट में डिमांड थी बिस्कुट की. और वो पूरी कर रही थी ब्रिटिश कंपनियां. साल 1939 से पारले ने इंडिया में ही बिस्कुट बनाकर उसे बेचना शुरू कर दिया. गाड़ी चल पड़ी. 1980 तक ये ‘पारले ग्लूको’ बिस्कुट के नाम से आती थी. बाद में इसका नाम बदलकर रख दिया गया ‘पारले-जी’. समय के साथ जिस ‘जी’ का माने ग्लूकोज़ हुआ करता था, वो बदलकर हो गया ‘जीनियस’. साथ ही इसके कवर पर दिखने वाली फोटो भी बदल गई. पहले इसके कवर पर गाएं और ग्वालन बनी होता थीं लेकिन बाद के दशक में उस ग्वालन को इस प्यारी सी बच्ची ने रिप्लेस कर दिया. ये कंपनी की प्रमोशनल स्ट्रेटजी थी.

इसके रैपर का कलर शुरू से ही सफेद और पीला रहा है. लेकिन इसके ऊपर दिखने वाली बच्ची को लेकर बहुत बार बहस हो चुकी है. नीरू देशपांडे, सुधा मूर्ति (आई.टी इंडस्ट्रियलिस्ट नारायण मूर्ति की पत्नी) और गुंजन गंडानिया नाम की तीन महिलाओं के इस बच्ची होने का दावा किया जाता रहा है. लेकिन मीडिया में नीरू देशपांडे को ही ये बच्ची माना गया है. नीरू के इस फोटो के पीछ की कहानी ये है कि जब वो साढ़े 4 साल की थीं, तब उनके पापा ने ये फोटो खींची थी. वो कोई प्रफोशनल फोटोग्रफर नहीं थे, लेकिन उनकी खींची इस फोटो को जिसने देखा उसने पसंद किया. इन्हीं चक्करों में ये फोटो किसी ऐसे आदमी के हाथ लग गई, जिसकी पारले वालों के साथ जान-पहचान थी. और इस तरह से उन्हें पारले के पैकेट पर फीचर होने का मौका मिल गया. हालांकि नीरू अब 62 साल की उम्रदराज़ महिला हो चुकी हैं.

इस खबर के साथ एक मिथ भी जुड़ा हुआ और वो ये कि कई जगहों पर पारले-जी के पैकेट पर दिखने वाली महिला का नाम नीरू देशपांडे बताया जाता रहा है लेकिन फोटो लगाई जाती है सुधा मूर्ति की. इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति. ये फोटो वाला झोल तो पता नहीं कब से चला आ रहा. लेकिन ये बात भी सही है कि नीरू की फोटो बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिलती, क्योंकि हर जगह सुधा की ही फोटो लगी हुई है.

तस्वीर को लेकर क्या कहना है कम्पनी का
इन सब बातों और अफवाहों से परे पारले कंपनी के प्रोडक्ट मैनेजर मयंक जैन का कहना है कि ये किसी असल इंसान की तस्वीर नहीं महज़ इलस्ट्रेशन भर है. 60 के दशक में मगनलाल दहिया नाम के एक आर्टिस्ट ने इसे बनाया था.