एक सरपंच क्यों चाहता था कि जनसुनवाई में उसका घोटाला सामने आए?

एक सरपंच क्यों चाहता था कि जनसुनवाई में उसका घोटाला सामने आए?
Published Date:
Monday, May 28, 2018 - 18:37

RTI यानि सूचना का अधिकार आज के दौर में जानकारी प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका है. लेकिन आरटीआई कानून के बनने की कहानी बहुत लंबी और संघर्षों से भरी है. इस कानून को बनाने में 18 साल का लंबा संघर्ष लगा.

इसकी शुरुआत तीन लोगों ने की थी. अरुणा रॉय जिन्होंने 1975 में अपनी आईएएस की नौकरी छोड़ी और समाजसेवा में आ गईं. निखिल डे जो पूर्व एयर चीफ मार्शल के बेटे थे. अमेरिका से पढ़ाई कर भारत वापस लौटे थे. और शंकर, जो राजस्थान के एक गांव के रहने वाले और गज़ब के वक्ता थे.

आरटीआई बनाने की इन लोगों की जर्नी पर ये बुक आई है. नाम है – “द आरटीआई स्टोरी – पावर टू द पीपल.” हिंदी टाइटल है – “आरटीआई कैसे आई!” इसे लिखा है अरुणा रॉय ने और इसका फॉरवर्ड लिखा है गोपालकृष्ण गांधी ने.

कैसे तीन अलग-अलग लोग साथ आए?

यह कहानी आरंभ हुई 1975 में. अरुणा रॉय ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और एक एनजीओ ‘सोशल वर्क एंड रिसर्च सेंटर’ (SWRS) के साथ जुड़ गईं. यह एनजीओ अजमेर (राजस्थान) के गांवों में किसानों-मजदूरों के लिए काम कर रहा था. अरुणा ने आठ साल इस संगठन में काम किया. इसी दौरान उनकी मुलाकात शंकर से हुई जो इस संगठन में अपनी कठपुतली कला के प्रदर्शन और भाषणों से जोश भरने का काम करते थे. इस संगठन ने 1981 में अजमेर की हरमाड़ा पंचायत में न्यूनतम मजदूरी के लिए धरना दिया था. उसमें शंकर के काम से अरुणा बहुत प्रभावित हुईं. 1983 में SWRS छोड़ने के बाद भी शंकर उनके साथ रहे. इसी साल उनकी मुलाकात निखिल डे से हुई जो अमेरिका से अपना स्नातक बीच में ही छोड़ कर आ गए थे क्योंकि वो भी किसान-मजदूरों के लिए काम करना चाहते थे. इस बात से उनके परिवारवाले नाराज थे. लेकिन वो अपने मिशन पर निकल चुके थे.

शंकर, अरुणा और निखिल.

1983 में तीनों ने मिलने के बाद तय किया कि वो एक साथ ही काम करने वाले हैं. इसके लिए उन्होंने जगह ढूंढ़नी शुरू की. राजस्थान और मध्य प्रदेश में बहुत जगहों पर घूमने के बाद उन्होंने तय किया कि वो अजमेर की शिव तहसील के गांव देवडूंगरी को अपना ठिकाना बनाएंगे. अरुणा और निखिल तो इस इलाके के लिए अंजान थे पर शंकर जानते-पहचानते थे.

देवडूंगरी की उस झोंपड़ी में रहे जहां शौचालय भी न था

1987 में ये तीनों देवडूंगरी पहुंचे. यह 15-20 घरों का एक गांव था. यहां शंकर की एक चचेरी बहन की झोंपड़ी में तीनों रहने लगे. लेकिन यहां रहना आसान नहीं था. न बिजली थी, न शौचालय. पीने के पानी तक का रोज इंतजाम करना होता था. रहने-सहने के अलावा जिस संघर्ष में वो जाने वाले थे वो भी लंबा चलना था.

इनकी लड़ाई शुरू हुई न्यूनतम मजदूरी की मांग से. उस समय सरकार ने 11 रुपए न्यूनतम मजदूरी तय की हुई थी. लेकिन पास के गांव सोहनगढ़ में बस दो-चार रुपए की दिहाड़ी मजदूरों को दी जा रही थी. इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए जब ये लोग पहुंचे तो वहां काम कर रहे मजदूरों ने इनकी बात मानी. वो अपना काम छोड़ उनके साथ धरने पर बैठ गए. सरपंच और अधिकारियों के खिलाफ जनसुनवाई की गई. इसके बाद मजदूरों की बात सुनी गई और उन्हें पूरी मजदूरी मिलनी शुरू हो गई.
इस छोटी जीत ने इस टीम को एक बड़ा नैतिक सहयोग दिया. उन्होंने एक नया ग्रुप “मजदूर किसान शक्ति संगठन” बनाया जो आगे जाकर आरटीआई को जन्म देने वाला बना. सोहनगढ़ में हुई जनसुनवाई की खबर आस-पास के इलाके में फैल गई.

सरपंच प्यारसिंह जो अपना ही घोटाला सामने लाना चाहता था

पास की एक पंचायत के सरपंच प्यार सिंह, अरुणा के पास आए और अपनी पंचायत में जनसुनवाई करने का आग्रह किया. ये अजीब था कि कोई अपने खिलाफ क्यों जनसुनवाई चाहता था. उसने बताया कि वह दलित है और गांव के दबंगों ने उसको मोहरा बना रखा है. वो सारे काम खुद करते हैं और उससे दस्तख़त करवाते हैं. उसके नाम से भ्रष्टाचार हो रहा था और आवाज उठाने पर धमकी दी जाती है.
अरुणा अपनी टीम और अधिकारियों के साथ वहां पहुंची. जनसुनवाई से पहले दबंगों ने धमकियां दीं. लेकिन लोग भी आए और अधिकारी भी. पंचायत में लाखों के गबन का मामला सामने आया. इसके लिए प्यार सिंह को निलंबित कर दिया और 1.60 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया. फिर भी वो खुश था कि अब उसके नाम से पाप नहीं होगा. इसके बाद आस-पास की बहुत सी पंचायतों में जनसुनवाई हुई और घोटाले सामने आए.

आधी रात को जब पुलिस ने लाठियों से मारा

जनसुनवाइयों के बाद भी कुछ जगह प्रशासन के लोग सहयोग नहीं करते थे. ऐसे में तहसील पर धरना आयोजित किया गया. यह धरना दिन में सही चला. स्थानीय लोग भी समर्थन में आए. रात को जब सभी लोग सड़क पर सो रहे थे तभी पुलिस आ गई. धरनास्थल खाली करने को बोला. धरने में महिलाएं भी शामिल थीं. लेकिन सभी ने एक स्वर में जगह खाली करने से मना कर दिया. पुलिस ने आधी रात में इन लोगों को लाठियों से मारा. घायल होने के बावजूद ये लोग वहीं जमे रहे. अगले दिन जब कस्बे में यह खबर फैली तो ज्यादा लोग इनके समर्थन में आ गए. इसके चलते प्रशासन को भी झुकना पड़ा. इस पुलिसिया कार्यवाई का एक साथ मुकाबला करने के बाद ये लोग और भी मुखर हो गए.

एक दुकान से चलाते थे अपना आंदोलन

इसके बाद तो ये आंदोलन बहुत तेजी से फैला. पंचायत से निकल तहसील स्तर तक पहुंचा. लेकिन आंदोलन बढ़ने के साथ फंड की भी जरूरत थी. इसकी जरूरत को पूरा करने के लिए MKSS ने शिव कस्बे में एक दुकान खोली. यह दुकान हर सामान को एक निश्चित फायदे पर बेचती थी. इस दुकान पर हर सामान को रोज दाम तय होता और माइक से उसका एनाउंसमेंट होता. इस दुकान पर ग्राहकों की लाइन लगने लगी. और पहले ही महीने लाखों में कमाई हुई. इस दुकान की इनकम का पूरा ब्यौरा एक बोर्ड पर रोज लिखा जाता और पूरी पारदर्शिता रखी जाती. इससे फंड की जरूरत भी पूरी हो गई और बहुत कमाई भी हुई.

क्यों महसूस हुई आरटीआई की जरूरत?

1995 तक ये आंदोलन न्यूनतम मजदूरी से आगे बढ़कर एक कानून की मांग तक पहुंच गया था. क्योंकि हर जगह सरकारी कागजों को छिपा लिया जाता था. सरकारी गोपनीयता कानून का हवाला दिया जाता और काम के लेखे-जोखे वाली मस्टर रोल तक को छिपा लिया जाता था. किसी भी जगह पर हुए काम के लिए मिले फंड और खर्चे तक को नहीं बताया जाता था. ऐसे में इन कागजों को निकालने के लिए एक कानून की जरूरत थी. जिससे एक आदमी कम से कम अपने हक के कागजों को निकाल सके. इस कानून को सूचना का अधिकार नाम दिया गया.

जयपुर का वो धरना जिसमें सीएम भैरोंसिंह को आना पड़ा

धीरे-धीरे ये आंदोलन बढ़ता हुआ 1996 में जयपुर तक पहुंच गया. यहां हुए धरना-प्रदर्शन ने इस आंदोलन को राज्यस्तर पर फेमस कर दिया. मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने धरने में आकर इनकी मांगों को पूरी करने की बात की और वापस लौट गए. इस धरने की खबर और मुख्यमंत्री का आश्वासन राजस्थान के सभी अखबारों की हैडलाइन बनी.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 1997 में फिर से पहले पूरे राजस्थान में और अंत में जयपुर में धरना दिया गया. यह मौका विपक्षी कांग्रेस ने लपक लिया और घोषणा की कि अगर उनकी सरकार आई तो सूचना के अधिकार का कानून बनाएंगे. इसके बाद अरुणा की टीम ने चुनावों में भैरोंसिंह शेखावत के खिलाफ प्रचार भी किया.

नए सीएम अशोक गहलोत को वादा याद दिलाना पड़ा

1999 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने. अरुणा ने उनको अपना वादा याद दिलाया. शुरुआती ना-नुकुर के बाद उन्होंने ये बात मानी. एक कमिटी बनाई गई जिसमें अरुणा भी थीं. एक कानून बनाया गया जो पूरा नहीं था. अरुणा ने विरोध किया तो आगे इसमें सुधार करने की बात कही गई
2001 में ‘लोगों के सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान (NCPRI)’ का सम्मेलन बुलाया गया. जिसमें मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों के मुख्यमंत्री अपनी बात कहने बुलाए गए. दोनों ने अपनी बात कही लेकिन ठोस कानून बनाने पर गोल-मोल बातें ही बोली.

यूं मिला आम आदमी को ये पावरफुल अधिकार

2002 में राजस्थान में पहली बार फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन आया. ये आरटीआई की तरफ पहला कदम था. 2003 में MKSS ने इस कानून को देश भर में लागू करने के लिए दिल्ली में आंदोलन किया. जहां इनकी मुलाकात अरविंद केजरीवाल से भी हुई. यहां इन्हें अन्य लोगों का समर्थन मिला. आखिर 2005 में फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन को केंद्र सरकार ने राइट टु इन्फॉर्मेशन बनाकर लागू कर दिया. साथ ही अरुणा को सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली एनएसी में जगह मिली. और इस कानून के लागू होने के बाद से आम आदमी को ये पावरफुल अधिकार मिला.

ख़ूबी और ख़ामी

अच्छी बात ये है कि अरुणा रॉय की 18 साल की दास्तान पढ़ते हुए आप जागरूक होते हैं कि सिस्टम के खिलाफ लड़ने में क्या-क्या परेशानियां आती हैं? साथ ही अनजान लोग अपने अधिकार के लिए कैसे संघर्ष के साथी बन गए ये भी इसमें अच्छे से बताया गया है. राजस्थान के सुदूर गांवों में जाकर वहां के दबंगों से टक्कर लेना, ईमानदारी के लिए अपनी जान जोखिम में डालना अरुणा से सीखा जा सकता है. MKSS में ऐसे भी लोग मिले जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ काम किया था. एक अनजान गांव में ऐसे लोगों से मिलने की कहानी भी मज़ेदार है.

थोड़ी कमी ये लगती है कि किताब में हर घटनाक्रम का बहुत विस्तृत वर्णन दिया गया है. छोटा भी किया जा सकता था. किताब पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि पूरे सिस्टम ने इस आंदोलन में कहीं मदद नहीं की, लेकिन सिस्टम का साथ भी मिला होगा जिससे सूचना का अधिकार सफल हो पाया. कुल मिलाकर राजस्थान के एक गांव से निकल, दिल्ली पहुंचकर देश के सबसे ताकतवर कानूनों में से एक के बनने की ये कहानी ज़रूर पढ़ने लायक है.
(EENADU India )