न्यायपालिका और सरकार आमने-सामने, अब जस्टिस कुरियन ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा पत्र

न्यायपालिका और सरकार आमने-सामने, अब जस्टिस कुरियन ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा पत्र
Thursday, April 12, 2018 - 23:37

नई दिल्ली ( जागरण ) । न्यायपालिका में उठा तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोलीजियम के सदस्य वरिष्ठ न्यायाधीश एक एक कर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। परिस्थितियां न्यायपालिका और सरकार के बीच तनातनी बढ़ने की नजर आ रही हैं। अभी जस्टिस चेलमेश्वर की ओर से न्यायपालिका में सरकार की दखलंदाजी पर आपत्ति उठाने वाली चिट्ठी की कहानी खत्म नही हुई थी कि दूसरे वरिष्ठ न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पत्र लिख कर न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोलीजियम की सिफारिश दबाकर बैठने के सरकार के रवैये पर ऐतराज जताया है। इतना ही नहीं जस्टिस जोसेफ ने मुख्य न्यायाधीश से इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेकर सात वरिष्ठ न्यायाधीशों की पीठ में सुनवाई किये जाने की बात कही है।

उधर दूसरी ओर जस्टिस जे. चेलमेश्वर के तल्ख तेवर बरकरार हैं। जस्टिस चेलमेश्वर ने प्रधान न्यायाधीश के पीठों का गठन करने के अधिकार पर सवाल उठाने वाली पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण की याचिका को सुनवाई के लिए लगाने का आदेश देने से इनकार कर दिया। साथ ही पुराने विवाद की ओर इशारा करते हुए ये टिप्पणी भी कर दी कि वे नहीं चाहते कि 24 घंटे के अंदर उनका फैसला पलट दिया जाए।

जजों के नाम पर घूसखोरी के मामले में कामिनी जायसवाल की जनहित याचिका को पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों के सामने सुनवाई के लिए लगाए जाने का जस्टिस चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ का फैसला 24 घंटे के भीतर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधानपीठ ने पलट दिया था। संविधानपीठ ने कहा था कि सुनवाई की पीठ तय करना सीजेआई का विशेषाधिकार है। कोई और न्यायाधीश ये तय नहीं कर सकता कि कौन सा केस कौन पीठ सुनेगी।

■ लंबा है विवाद ■

नवंबर की इस घटना के बाद जनवरी में न्यायपालिका में अभूतपूर्व तूफान उठा जब इतिहास पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने जस्टिस चेलमेश्वर के घर प्रेस कान्फ्रेस कर प्रधान न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उस कान्फ्रेंस में उन्होंने सीजेआई को लिखा गया एक पत्र भी सार्वजनिक किया, जिसमें कार्य आवंटन और न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया एमओपी का मुद्दा उठाया गया था। इसके बाद जस्टिस चेलमेश्वर ने 21 मार्च को मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा जिसमें न सिर्फ सरकार पर कर्नाटक के जज कृष्ण भट्ट को हाईकोर्ट प्रोन्नत किये जाने की कोलीजियम की सिफारिश दबा कर बैठ जाने का आरोप लगाया, बल्कि न्यायपालिका में दखलंदाजी का भी आरोप लगाया था।

उन्होंने जज भट्ट पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए सीधे कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को कानून मंत्रालय की ओर से पत्र भेजे पर आपत्ति जताते हुए मामले पर फुल कोर्ट में विचार किये जाने का सुझाव दिया था। इस पत्र के जवाब में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी गत 5 अप्रैल को सीजेआई मिश्रा को पत्र लिख कर जज भट्ट पर महिला जज द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की बात कही और उच्च न्यायिक मूल्यों की नसीहत देते हुए ये भी कह दिया कि क्या निष्पक्ष जांच पूरी न होने तक कोलीजियम को भट्ट की प्रोन्नति की सिफारिश रोक कर नहीं रखनी चाहिए।