जालौर : 100 साल पुरानी गैर संस्कृति फिर उतरी रेतीली धरा पर

जालौर : 100 साल पुरानी गैर संस्कृति फिर उतरी रेतीली धरा पर
Published Date:

देश भर में रंगों का त्यौहार होली धूमधाम से मनाया गया।होलिका दहन के साथ होली आरंभ हुआ । शुक्रवार सुबह से ही लोग सड़कों पर निकल गए। वे रंग लगा एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं देते नजर आए।मारवाड़ में जगह-जगह लोग सुबह से ही सड़कों पर निकल पड़े ।

इस बीच घरों में तरह-तरह के व्‍यंजन बनाने का सिलसिला भी जारी रहा।होली को लेकर बच्‍चों  युवाओं में अधिक उत्‍साह देखा गया। इन सभी से दूर रेतीले मारवाड़ के जालोर जिले के पंसेरी गाँव मे सो साल पुरानी संस्क्रति धरा पर उतरती नजर आई। जालौर के पंसेरी गाँव मे 100 साल पहले 7 दिवसीय गैर महोत्सव की शुरुआत की गई थी

हालांकि आधुनिकता की तेज दौड़ औऱ डीजे की तरफ बढ़ते सामाजिक माहौल ने इस महोत्सव को तीन दिन तक ही सीमित कर दिया है लेकिन गाँव के लोगो की हिम्मत और आसपास के गाँव के लोगो का साथ इस महोत्सव को होली के दूसरे दिन अपने चरम शिखर पर ले जाता है।पंसेरी के ठाकुर नेपाल सिंह देवल बताते है कि इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए सरकार और पर्यटन विभाग सामने आए तो इस जगह को काफी राहत मिलेगी।ढोल की थाप और थाली की टंकार पर सधे हुए कदम, सुरों पर धम्म से जमीन पर पड़ती गैर नृर्तकों की एडिय़ां, पांवों में बंधे घुंघुरुओं की खनक और हाथों में टकराते डांडियों की धुन। ऐसा ही मनोहारी नजारा दिखाई दिया जालौर के छोटे से गाँव पंसेरी की होली में। यहां की होली गैर नृत्य के रंगों से सराबोर दिखाई दी। 
किलंगी बांधे दूल्हे की तरह सजे गैर नृत्यकों का गोल घूमने का शाही अंदाज अपने आप में रोमांच भरा था। आयोजन में आस-पास के दर्जनों गांवों के हजारों लोगों ने शिरकत की। गोधुली बेला का सूर्य लालिमा बिखेर रहा था, लेकिन कदम थम रहे थे और ना ही लोगों का उत्साह। होली की मस्ती में मस्त गैर नृत्यकों ने माहौल को अपने ही रंग में रंग दिया।