वो दिन दूर नही जब शुरू होगा गृह युद्ध शुरू,नेताओं की देन है टकराव

वो दिन दूर नही जब शुरू होगा गृह युद्ध शुरू,नेताओं की देन है टकराव
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एसटी,एससी संगठनों की ओर से बंद और आरक्षण के कट्टर विरोधियों में टकराव से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैचारिक मतभेद काफी लंबे समय से ही चले आ रहे है।

अब वैचारिक मतभेद सड़क पर आकर आमने सामने शुरू होने वाले है।ये मतभेद आगामी दिनों में मोहल्लों से लेकर सरकारी कार्यालयों में देखने को मिलेंगे।यानी एक दूसरे से नफरत और हीनभावना।कुछ हद तक आरक्षण विरोधियों का तर्क ठीक भी है।विकलांग को बैसाखी देने के बाद भी किसी की सहायता की आवश्यकता पड़े तो मान लीजिए वह कभी खड़ा हो ही नहीं सकता।असल मे मनुष्य की मानसिकता बन गई है कि बिना मेहनत के ही वो तमाम सुख सुविधाएं मिल जाए जिसको पाने के लिए विद्यार्थी जीवन मे तपस्या करनी पड़ती है।अपराध भी वही व्यक्ति करता है जिसकी नियत ही हराम की खाने की हो जाती है।

बेटा, पिता ,चाचा,ताऊ या अन्य किसी की हत्या के पीछे भी फोकट में दौलत की ही चाहत होती है।असल मे दिमाग से कमजोर व्यक्ति को भी आसानी से सफलता मिल जाए और उस युवक को अथाह मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिले तो पीड़ा तो अवश्य होगी ही।

इस देश की विडंबना है कि यहाँ भिखारी बनना आसान ही नहीं बल्कि भिखारी बनकर कमाना भी आसान है इसलिए विश्व मे सबसे अधिक भिखारी हिंदुस्तान में ही है।

अलवर जिले में भी भगवा पोशाक पहनकर महाराजा भृर्तहरि के नाम सुबह भीख मांगी जाती और शाम को उसी भीख से शराब और मांस खाया जाता है।अब ऐसे व्यक्ति को मेहनत करने की सलाह देना महंगा पड़ सकता है।यानी उसकी फितरत में भीख मांगना ही रच,बस गया है।

दूसरी ओर इसी देश मे ऐसे समाज है जिन्होंने सरकार से कोई उम्मीद नहीं की और अपने स्तर पर देश मे अलग पहचान बनाई है।पाकिस्तान से बेघर होकर आए सिंधी और पंजाबी समाज शरणार्थी ही थे।उन के पास उस समय तन ढ़कने के अलावा कुछ नहीं था। सिंधी,पंजाबी समाज सहित अनेक समाज आज भी सरकार से कोई उम्मीद नहीं करते।बल्कि सिंधी और पंजाबी समाज के लोग दूसरों को जीने का आइना और दिखाते है। इस समाज के लोग अपनी मेहनत पर भरोसा करते है और करते रहेंगे।बन्द की घोषणा करने वाले कथित नेताओं को जरा भी यह ज्ञान नहीं है कि बन्द के दूरगामी परिणाम खतरनाक ही होंगे।किसी पार्टी के एजेंडे पर कुछ लोग चलकर अपनी ओछी राजनीति कर रहे है। अदालत के फैसले के खिलाफ ही खड़े हो जाने का अर्थ है कि लोगों को कानून पर भरोसा नहीं है।दरअसल योग्यता की कद्र होनी ही चाहिए।योग्यता की बेकद्री होगी तो वह नोजवान अवश्य भटकेगा।

देश के तमाम आर्थिक रूप से कमजोर किसी भी जाति,धर्म के लोगों को शिक्षा पाने या फिर अपने व्यापार को करने के लिए आर्थिक सहयोग मिलना ही चाहिए।आर्थिक सहयोग का यह भी अर्थ नहीं कि उन्हें किसी भी संस्थान में योग्यता के विपरित नियुक्ति दे दी जाए।वास्तव में उस ही युवा या व्यक्ति को ही वह हक दिया जाना चाहिए जो उस सफलता का हकदार है। महिलाओं को दिया जा रहा आरक्षण भी परिवारों की बर्बादी का मुख्य कारण बनता जा रहा है।सरकार को महिला आरक्षण पर भी पुर्न विचार करना ही चाहिए। या फिर आरक्षण का लाभ ले चुके तमाम सम्पन्न स्त्री,पुरुष गैस सब्सिडी की तरह ही स्वेच्छा से आरक्षण का लाभ छोड़ दे।जिस प्रकार सब्सिडी छोड़ने से उन तमाम लोगों को भी गैस कनेक्शन मिल गया जिन्होंने उम्मीद ही नहीं की थी।इसी प्रकार अब सबको आरक्षण का लाभ भी उन्हीं परिवारों को दिलाने का प्रयास शुरू कर देना चाहिए जो परिवार समाज की मुख्यधारा से दूर हो गए है।हम कह सकते है बन्द पूर्णयता असफल होगा।

बन्द में हम बाजारों को ही बन्द होने के बाद बन्द को सफल मानते है जबकि जिस वर्ग ने बन्द का ऐलान किया है उस वर्ग का बाजारों में कोई अस्तित्व ही नहीं है। वहीं समता आंदोलन समिति ने बन्द का विरोध कर के यह साबित कर दिया कि वे अदालत के निर्णय का सम्मान करते है।बहरहाल देश के नेताओं ने अंग्रेजों की तरह जिस उद्देश्य के लिए देश के लोगों को जाति, धर्म की आग में धकेला था उसकी आग से वे भी अछूते नहीं रहेंगे। यानी अब " ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी "