माता बनी कुमाता

माता बनी कुमाता
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लेखिका : स्वाति ( स्वतंत्र टिपण्णीकार )

कहते हैं जन्म देने और प्राण लेने का अधिकार क्षेत्र सिर्फ ईश्वर के पास है| मगर जहां आज की दुनिया एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्रों का हनन और हस्तक्षेप कर रही, लगता है यह घुसपैठ ईश्वर के कार्यक्षेत्र में भी हो रहा| जन्म देने का तो पता नहीं, मगर मृत्यु की वीभत्स घटनाएं देखकर ऐसा जरूर लगने लगा है कि इंसान मौत देने के ताकत पर एकलौता राज़ करना चाहता है! ये आशंकाएं तब और प्रबल होने लग रही है जब जन्मदात्री माँ ही अपने बच्चों को मौत देने लगे! वैसे ये कोई नया शगूफ़ा नहीं है, भ्रूण हत्या के हथियार से अजन्मे बच्चियों के चाहे-अनचाहे टुकड़े करने की सच्चाई तो दशकों से आंखों के सामने हैं ही| मगर अब कारण और कृत्य नये-नये रूप ले रहे हैं| भाव में पगी ममता में स्याह लाही लग रही है जो शनैः- शनैः लीलती चली जा रही है|

अभी केरल में हुई एक घटना ने मातृत्व को शर्मसार किया है| एक हॉस्पिटल में जब किसी सफाई कर्मी ने पाया कि टॉयलेट जाम है और फ्लश नहीं हो रहा तो प्लंबर को बुलाया गया| प्लंबर को आश्चर्यजनक तरीके से टॉयलेट में बच्ची का सर दिखा| डक्ट को पूरी तरह खोदने पर नवजात का शव मिला| मिडिया रिपोर्ट के अनुसार उस बच्ची को माँ ने टॉयलेट में ही जन्म दिया होगा क्यंकि गर्भनाल जुड़ा हुआ था| बच्ची का शव दो दिन पुराना है और इस कुकर्म को करने वाले माँ का पता अभी नहीं लगा है| अपराधियों के धर-पकड़ के लिए अस्पताल के डाटा को खंगाला जा रहा है| 

इतनी शर्मनाक और भयानक घटना को अंजाम देने वाली माँ की मानसिकता क्या रही होगी? वह भावनाओं के किस आवेग से गुजरी होगी जिसमें ममता का गला घोंट दिया गया? इंसानी रूप में जिस  रिश्ते का मान और ओहदा सबसे ऊँचा है, इस करतूत ने उस ओहदे को पाताल में ढ़केल दिया| 

सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य के हैवानियत मंसूबों की ऐसी घटना पहली नहीं है| अभी इसी साल जनवरी में केरल में ही एक माँ ने अपने 14 साल के बेटे की जान आवेश में आकर इस बात पर ले ली क्योंकि बेटा अपने दादा-दादी के घर अक्सर जाता था जो माँ को पसंद नहीं था| एक दिन बेटा दादा-दादी से मिलने निकलने लगा तो गुस्से में माँ ने बेटे को मारकर जला दिया और अपने ही अहाते में दफना भी दिया|  जिस आवेश में शातिर कातिल के दिमाग सा काम करने लगा और बच्चे के गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज़ कराई गई| बार-बार बयानों में उलट-फेर होने से शक की स्तिथि में जांच करने पर यह दिल दहलाने वाला सच सामने आया| ऐसा नहीं है कि ऐसी वारदातें सिर्फ केरल में हो रही|

पूरे देश-दुनिया में इस तरह की ख़ास घटनाएं आम हो रही हैं| अभी कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका में एक माँ को मौत की सज़ा इसलिए दी गयी क्योंकि उसने अपने 9 साल के बेटे को भूखे तड़पा-तड़पा कर मार दिया था| पिछले साल राजधानी दिल्ली में भी एक माँ ने 6 साल की बेटी को इसलिए मार दिया क्योंकि बेटी ने उसे प्रेमी के साथ देख लिया था| 

केरल के उदाहरण इसलिए सामने लाये गए ताकि शिक्षा में आए नैतिक शिक्षा के अभाव को महसूस किया जा सके और समझा जा सके कि शिक्षित होने का यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति संवेदनशील और सत्कर्मी ही हो| देश के सबसे शिक्षित राज्य के दर्ज़े पर शोभायमान केरल में ऐसी घटनायें शिक्षा के प्रचारित-प्रसारित अर्थ को कटघरे में कर रही है| 

स्त्री के सबसे सौम्य रूप की यह कुरूपता भले ही हलक के नीचे ना उतरे मगर सच्चाई चीख रही है| ममता में ऐसी मिलावट कौतूहल और क्रोध का विषय है| ऐसा क्या पनपता जा रहा जो स्वर्ग से भी बढ़कर स्थान रखने वाली माँ की ममता आए दिन लज्जित हो रही है? भावनात्मक विकास के  कौन से  चरण में आसुरी प्रवृत्ति की मिलावट हो गई? इन सबका उत्तर आसान नहीं| मगर उत्तर ढूंढना होगा| आवेश पर काबू ना रख पाना, बच्चों को विशेषकर लड़कियों को बोझ समझना, विवाहेतर संबंधों या तलाक-वैधव्य के बाद नये जीवन की शुरुआत में बच्चों को बाधा समझना आदि कुछ कारण समझ आते हैं| 

इंसान स्वार्थ में तो लिपटता जा ही रहा है साथ ही अपने रिश्तों में इतना प्रैक्टिकल होता जा रहा है कि उसे निभाने की बजाय उसके दर्दनाक अंत से भी परहेज़ नहीं कर रहा है| सहनशक्ति समाप्त होती जा रही और उन्मुक्तता उच्छृंखलता में तब्दील होती जा रही है|  हम इतने आज़ाद रहना चाह रहे हैं कि आवश्यक बंधन से भी हमारा दम घुटने लग रहा है। बच्चों का हमारे मर्ज़ी के खिलाफ जाने पर एक ओर हम उनकी जान ही ले ले रहे तो दूसरी ओर बच्चों को सुधारने या समझाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं| 
मानवीय गुणों पर कुत्सित विचारों का हावी होना समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है| कहते हैं पुत्र चाहे बुरा निकल जाए मगर माँ कभी कुमाता नहीं हो सकती|  मगर ऐसे बढ़ते अपराध इन बातों को नकार रही है| जरुरत है भावनाओं पर नियंत्रण और संतुलन की| माँ जैसा गौरवमयी पद कलंकित होने से बचे|