बलात्कार की पसरी जड़ें

बलात्कार की पसरी जड़ें
Saturday, April 14, 2018 - 13:15

कहते हैं डंडे के डर से गधा भी इंसानी बोल समझने लगता है|  मगर जब डंडा और दंड बे असर हो| साम-दाम-भेद भी कारगार सिद्ध ना हो तो समस्या का समाधान कैसे किया जाए?  जब ऐसे अपराध सर चढ़ कर बोलने लगे तो येन केन प्रकारेण हल तो निकालना ही होगा| लड़कियों को लीलता बलात्कार और अट्टहास करते बलात्कारी समाज की वह सच्चाई है जो अपनी लहक में सब कुछ होम कर रहे हैं| इन बलात्कारियों को ना शर्म है और ना ही कानून-प्रशासन का डर| 
शायद बलात्कार स्त्री के प्रति होने वाला सबसे हिंसक अपराध है जो उसे ऐसी अंधेरी गलियों में छोड़ आता है जिसमें वह आजीवन भटकती रहती है| इस ब्लैक होल का कोई ओर-छोर नहीं होता है और ना ही कोई भविष्य! शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, भावनात्मक हर तरीके से  टूटी लड़की के पास समाज के सवाल, कई बार आरोप और लगभग हर बार अस्वीकृति होती है| आत्म-सम्मान और गौरव की जो धज्जियाँ उड़ती हैं उसको संजोने वाला भी अमूमन कोई नहीं होता| पता नहीं सभ्य समाज में पहला दर्ज़ बलात्कार कितना पुराना है और यह पैशाचिक प्रवृत्ति कितने सदियों से कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों के नसों में दौड़ रही है पर इतना तय है यह छुआछूत वाले रोगों की भांति फैलती चली जा रही है| हर रोज़ बलात्कार के सामान्यतया 5-6 केस टॉप 100 न्यूज़ में होते हैं जो चंद सेकेण्ड में समेट लिए जाते हैं| मगर वास्तविक आकंड़ें तो अब भी वास्तविकता के पटल से दूर ही हैं जो शर्म, डर या तथाकथित ''इज्जत'' की काली चादर ओढ़ ज़मीन दोज़ कर दिए जाते हैं| तिस पर भी दर्ज़ आंकड़ें ही जो बयान कर रहे हैं वो रूह कंपाने के लिए काफ़ी हैं| बलात्कार अब जीवन का सामान्य और नियमित हिस्सा बन गया है जिसका महत्व प्याज के दाम के चर्चा सा औचित्यहीन लगता है| 

 चर्चाएं गर्म तो हैं पर असर कुछ भी नहीं
आज-कल फिर बलात्कार चर्चा में है| उन्नाव और कठुआ काण्ड ने बलात्कार पर विमर्श करने के लिए एक बार फिर रास्ते खोले| मगर हम क्या चर्चा कर रहे हैं और हम बलात्कार पर कब चर्चा करते हैं? हम तो ऐसे प्राणी हैं जो बलात्कार को समस्या जानते तो हैं मगर मानते नहीं| समस्या मानते तो इसकी जड़ों को खोदते और समाधान निकालते| परन्तु ऐसा लगता है हमने इस अपराध के आगे आत्म-समर्पण कर दिया है| इस अपराध पर अभी ध्यानाकर्षण का कारण है इनके केंद्र में राजनैतिक और धार्मिक दृष्टिकोण का सामावेश! वरना किसे पड़ी है जानने की कि यहाँ कितनी गुड़िया रोज़ कुचली जा रही है| अभी बिहार भी 6 साल की बच्ची के बलात्कार  का दंश झेल रहा है|  
हम भूल जाते हैं बलात्कार की घटनाओं का मूल कारण हवस है जो औरत को देह के रूप में मात्र दो बिलांग में देख पाती है| इस सोच के कारण को समझने की जरुरत है| उन कारणों को कुरेदने की दरकार है| आज तक कोई ऐसा सूत्र या थ्योरी नहीं बनी जो इंसानी फितरत को आंक सके| इंसानों की बस्ती में कर्म से महक बिखरते इंसान भी नज़र आ जाते हैं और कुकर्मों के दुर्गन्ध से अभिशापित करते इंसान भी! स्त्रियों को सतर्क रहने की जरुरत है विशेषकर बच्चियों के मामले में एहतियात बरतने की जरुरत है| ये वो ज़माना नहीं जहाँ कुख्यात दुर्दांत अंगुलिमाल जैसा अपराधी दर्शन और सत्य को समझ और स्वीकार ले| 
बच्चों की परवरिश और माहौल को सबसे पहले भेद-भाव रहित बनाना होगा| लड़कियों को शारीरिक दुर्बलता से परखा जाना बंद करना होगा| बचपन से ही लड़कियों के पहनावे ओढ़ावे को लेकर घुटन वाला माहौल बनाना बंद करना होगा| जितनी शिक्षा हम लड़कियों को उनके आचार-व्यवहार पर देते हैं उतनी ही शिक्षा हमने अपने लड़कों को भी देनी होगी| घर से बाहर जाने पर जिन सतर्कताओं की लिस्ट हम बच्चियों को थमाते हैं वैसी ही लिस्ट बाहर निकलते वक्त लड़कों को भी थमानी होगी कि उन्हें लड़कों की इज्जत कैसे करनी है| घर के माहौल में पति-पत्नी के बीच की झड़पों को भी बच्चों के सामने लाने से बचना होगा विशेषकर जिन झगड़ों में पुरुष शारीरिक तौर पर महिलाओं पर हावी होते हैं| उनके सामने ऐसे किसी भी बात से बचा जाए जिसमें घर की औरतों या लड़कियों को सहने और अपना पक्ष तक ना रखने का सन्देश जाता हो| बढ़ते बच्चों की संगति क्या बन रही है वो किस तरह के पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ रहे हैं, किस तरह की फिल्मों का चयन करते हैं, इंटरनेट पर उनकी अभिरुचि क्या है, बलात्कार या छेड़-चाँद जैसे मुद्दों पर अपनी क्या राय रखते हैं, अपनी बहनों के बर्ताव या लड़कों के साथ बात-चीत या पहनावे पर क्या टिपण्णी देते हैं, इन सब पर नज़र रखने की जरुरत है|  
जब तक पारिवार में  बच्चों की संवेदनाओं को पोषण और उचित दिशा-निर्देशन नहीं मिलेगा, इन्हें  भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर विकसित नहीं किया जाएगा तब तक इसका समाधान नामुमकिन है| जरुरत है अभी सम्मिलित रूप से जागरूकता की| दुष्कर्मों पर पर्दा डालना या नज़रअंदाज़ करना सरासर गलत है| छेड़-छाड़ की घटना को भी सामान्य  नहीं समझना होगा| दोषियों का पारिवारिक बहिष्कार भी जरुरी है ताकि कड़ा सन्देश जाए| कानून- प्रशासन तभी असर करेंगे जब परिवार इनके साथ ना खड़ा हो| 

 लेखक : स्वाति ( स्वतंत्र टिप्पणीकार )