न्याय नही मिल रहा मैं आत्महत्या कर लूंगी : मै दलित महिला हूं

न्याय नही मिल रहा मैं आत्महत्या कर लूंगी : मै दलित महिला हूं
Monday, April 2, 2018 - 07:45

मेरे साथ नाइंसाफी हुई, क्या कर लिया उस कानून ने जिसके लिए दलित वर्ग जबरन भारत बन्द करा रहा है।

यह पीड़ा उस कम उम्र की दलित महिला की है, जिसको दलित होने के कारण आधुनिक समाज ने नकार दिया।उसे उस कानून से भी न्याय नहीं मिला जिस कानून को दलित को अपमानित होने से बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन कुछ शातिर किस्म के लोगों ने इसी कानून का जमकर उल्लंघन कर कानून के काले पर्दे के पीछे राजीनामे के नाम पर मोटी रकम बटोरी है

,लेकिन किसी वास्तविक पीड़ित को इस कानून से राहत नहीं मिले तो उस कानून को ही समाप्त कर देना चाहिए।कानून केवल दिखावा साबित हो तो यह दुर्भाग्य पूर्ण ही है। वास्तविकता भी यहीं है कानून किसी को सजा अवश्य दिला सकता है लेकिन मानसिकता नहीं बदल सकता।*

दरअसल, गत तीन दिन से एक अनजान 23 वर्षीय महिला मुझे मोबाइल करती और सीधे यही कहती मुझे न्याय नहीं मिल रहा मैं आत्महत्या करूंगी। आज मै उस महिला से मिला।मिलने पर भी वहीं बात दोहराई मैं आत्महत्या करूंगी।करीब एक घण्टे उसी की पीड़ा सुनी तो हमारा मन भी भारी हो गया,लेकिन उस महिला की एक विशेषता यह थी कि वह मेरी कम सुन रही थी और सुना कुछ ज्यादा ही रही थी।

असल मे 23 वर्षीय जाटव (एससी)महिला एमए,बीएड है और अलवर शहर की रहने वाली है।उसकी जिंदगी में अलवर शहर का ही उस जाति का युवक आया जिसे युवक और उसके परिजन श्रीकृष्ण के वंशज मानते है। मित्रता हुई फिर प्रेम और उसके बाद आधुनिक समाज के चलन में चल रहा प्रेम विवाह हुआ।आप जरा सोचिए और मनन कीजिए प्रेम विवाह के बाद जाटव जाति का पेच ऐसा फंसा की महिला के अरमानों का गला ही घुट गया।दस जुलाई को प्रेम विवाह हुआ और किराए के मकान में रहते हुए 27 नवम्बर को आसमान से तारे तोड़कर लाने का सपने दिखाने वाला उसका पति(प्रेमी)अपनी योजना के तहत लापता(फरार) हो गया।

उसके बाद उस पीड़िता का पति से सम्पर्क खत्म हो गया। पति के चकमे से परेशान और अपने ससुराल एवम पीहर से बेघर दलित पीड़िता ने कानून का सहारा भी लिया लेकिन वह कानून उसके लिए मददगार साबित नहीं हुआ।ऐसा है वह कानून जिसको लेकर दलित वर्ग देश को ही बन्द करा रहा है।असल में दलित पीड़िता की आंखों में अपने शातिर पति को पाने की आज भी उम्मीद है, इज्जत और बेपनाह प्यार है। वह चाहती है उसका खोया प्यार वापस मिल जाए लेकिन दुर्भाग्य है इस देश का नेताओं ने सत्तासुख के लिए दलित को वर्तमान में महादलित बना दिया और इसी महादलित की राजनीति ने उसके प्यार की धज्जियां उड़ा दी।

दरअसल किसी भी प्रकार की सरकार की सहूलियत से दलित वर्ग अपना आर्थिक उत्थान कर वह महलों में रह अवश्य सकता है,लेकिन वह दलित यह सोच ले कि उसकी शानो शौकत से किसी की मानसिकता बदल जाएगी यह असम्भव है।इसीलिए अब समय आ गया है कि अपमानित करने वाले दलित शब्द को ही इस देश से उखाड़ फेंके जिससे ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी लेकिन यह सम्भव नहीं है।

साफ जाहिर है जंगल का शेर जिस प्रकार शिकार करना नहीं छोड़ सकता ठीक उसी प्रकार दलित वर्ग चटपटी मिठाई की गोली आरक्षण को नहीं छोड़ सकता।हो सकता हो उनको अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं हो लेकिन उस अपमानित होने वाली बैसाखी के सहारे खड़े होने से शायद बेहतर है दलित वर्ग अपने पैरों को मजबूत करें और एक नई जिंदगी की शुरुआत करें