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Special Report: कोरोना वायरस की महामारी से निपटने के लिए कितना तैयार है भारत?

आंकड़े बता रहे हैं कि कई देशों की सरकारों ने इसकी चाप को समय रहते नहीं सुना. इसमें अमेरिका, इटली से लेकर ईरान तक शामिल हैं. स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को थोड़ी देर के लिए दरकिनार भी कर दें तो तकरीबन हर जगह की सरकारों ने तब तक कोई एक्शन नहीं लिया, जब तक यह बीमारी गुपचुप तरीके से महामारी नहीं बन गई.
पूरी दुनिया के लिए खौफ का दूसरा नाम बन चुके कोरोना वायरस की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है इसकी चाल. पहले इसके लक्षण इक्का दुक्का लोगों में दिखते हैं, लेकिन दो से तीन हफ्ते में जंगल की आग की तरह फैलते हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि कई देशों की सरकारों ने इसकी चाप को समय रहते नहीं सुना. इसमें अमेरिका, इटली से लेकर ईरान तक शामिल हैं. स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को थोड़ी देर के लिए दरकिनार भी कर दें तो तकरीबन हर जगह की सरकारों ने तब तक कोई एक्शन नहीं लिया, जब तक यह बीमारी गुपचुप तरीके से महामारी नहीं बन गई.

बीमारी को रोकने के कम और शेयर बाजार के गिरने से लेकर राजनीतिक उठापटक की चिंता तकरीबन सभी देशों ने ज्यादा दिखाई. कोरोना वायरस से जुड़े विभिन्न देशों के आंकड़े और मॉडल बता रहे हैं कि सरकार की ओर से जारी मरीजों की संख्या के मुकाबले यह बीमारी दस गुना पैठ बना चुकी होती है. एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर सरकारें आउटब्रेक से पहले सजगता दिखाती हैं तो इसके फैलने की संभावना को दस गुना कम किया जा सकता है.
निमोनिया की तरह दिखने वाली बीमारी दबे पांव आपके करीब आ गई है. चीन में इसके फैलने और उसे रोकने के लिए वहां की विफलता और सफलता से बहुत सारे देशों ने कुछ नहीं सीखा. कुछ चीन के खानपान और चमगादड़ गिनते रहे और कुछ ने विकसित होने के दंभ में अपने सैकड़ों नागरिकों की जान जोखिम में डाल दी. तीन देशों-इटली, ईरान और अमेरिका का उदाहरण सामने है. केवल एक हफ्ते में कोरोना वायरस के नए मरीजों और उसकी वजह से दम तोड़ने वालों की संख्या चीन से आगे निकल चुकी है. सवाल है कि क्या भारत इस बीमारी के बड़े आउटब्रेक के लिए तैयार है.
फिलहाल कोरोना दुनिया के सौ से ज्यादा देशों में फैल चुका है. चीन का अनुभव बताता है कि कैसे सरकार शुरुआत में फेल हो गई लेकिन बाद में शहरों के लॉक डॉउन के जरिए इस बीमारी को नियंत्रित कर लिया गया. यहां सरकार की प्रतिक्रिया में लगने वाला समय महत्वपूर्ण है. इटली, जर्मनी, ईरान और अमेरिका जैसे देशों ने आपाधापी में लॉकडाउन उस समय शुरू किया जब मामला काफी बिगड़ चुका है.

सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंस) इस बीमारी को रोकने का पहला कदम होना था लेकिन यह आखिरी कदम के रूप में इस्तेमाल हुआ है. हालांकि भारत में कुछ जगहों पर ‘सामाजिक दूरी’ जैसे स्कूल, मेला या दूसरे तरह के सामूहिक आयोजनों पर रोक लगी है लेकिन इनकी संख्या बहुत सीमित है. ये कदम क्यों महत्वपूर्ण है इसे हम कोरोना वायरस के केंद्र में रहे चीन के हुबई प्रांत की पड़ताल से समझ सकते हैं.

चीन का अनुभव

26 दिसंबर को चीन के हुबई प्रांत की राजधानी वुहान में एचआईसीडब्लूएम हॉस्पीटल के डॉक्टर जिंग्सियांग झांग ने चार मरीजों में निमोनिया जैसी लगने वाली अजीब बीमारी देखी. झांग ने 27 दिसंबर को इसकी जानकारी स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को दी. 28 और 29 दिसंबर को ठीक वैसी ही बीमारी वाले तीन और मरीज उनके पास आए. 30 दिसंबर को भी कुछ और मरीज आने लगे. 31 दिसंबर को वुहान हेल्थ कमीशन ने चीन सरकार के केंद्रीय हेल्थ कमीशन को एक अनजान बीमारी के बारे में एलर्ट किया. उसी दिन चीन सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी इस बीमारी के बारे में जानकारी दी.

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