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गढ़कुंडार का किला -जहां अचानक गायब हो गई थी पूरी की पूरी बरात

 

गढ़ कुंढार मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित एक गाँव है। इस गाँव का नाम यहां स्थित प्रसिद्ध दुर्ग (या गढ़) के नाम पर पढ़ा है। यह किला उस काल की न केवल बेजोड़ शिल्पकला का नमूना है बल्कि उस खूनी प्रणय गाथा के अंत का गवाह भी है,
गढ़कुंडार में भी एक ऐसा ही किला है, जो बेहद रहस्मयी है। इस किले में दो फ्लोर का बेसमेंट है।बताते हैं कि इसमें इतना खजाना है कि भारत अमीर हो जाए।

ये है किले का इतिहास-

बुंदेलखंड के किलों पर बीएचयू से शोध करने वाले अजय सिंह के मुताबिक,, ये किला चंदेल काल में चंदेलों का सुबाई मुख्यालय और सैनिक अड्डा था। यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था। इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया।

इसमें किलेदार भी रखा गया।

1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए। इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई। इसके बाद यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया। 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज्य ही रहा। इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहां खुद को स्थापित कर लिया।-
1257 से 1539 तक यानि 283 साल तक इस पर बुंदेलों का शासन रहा। इसके बाद ये किला वीरान होता चला गया। 1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली।
उन्होंने प्राचीन चंदेला युग, कुठारी, भूतल घर जीर्णोधार कराकर गढ़कुंडार को किलों की पहली पंक्ति में स्थापित कर दिया। 13वीं से 16वीं शताब्दी तक ये बुंदेला शासकों की राजधानी रही। 1531 में राजा रुद्र प्रताप देव ने गढ़कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली।
गढ़कुंडार किले के पुनर्निर्माण और इसे नई पहचान देने का श्रेय खंगारों को है। खेत सिंह गुजरात राज्य के राजा रूढ़देव के बेटे थे। रूढ़देव और पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सिंह अभिन्न मित्र हुआ करते थे।-
इसके चलते पृथ्वीराज चौहान और खेत सिंह बचपन से ही मित्र हो गए। राजा खेत सिंह की गिनती पृथ्वीराज के महान सेनापतियों में की जाती थी। इस बात का उल्लेख चंदररदाई के रासों में भी है। गढ़कुंडार में खेत सिंह ने खंगार राज्य की नींव डाली थी।
2000 साल पुराना है किला
झांसी के मऊरानीपुर नेशनल हाइवे से 18 किलोमीटर अंदर गढ़कुंडार का किला पड़ता है। 11वीं सदी में बना ये किला 5 मंजिल का है। 3 मंजिल तो ऊपर हैं, जबकि 2 मंजिल जमीन के नीचे है।ये कब बनाया गया, किसने बनवाया इसकी जानकारी उपलब्ध ही नहीं है। बताते हैं कि ये किला 1500 से 2000 साल पुराना है। यहां चंदेलों, बुंदेलों, खंगार कई शासकों का शासन रहा।

घूमने आई बरात हो गई थी गायब


आसपास के लोग बताते हैं कि काफी समय पहले यहां पास के ही गांव में एक बरात आई थी। बरात यहां किले में घूमने आई। घूमते-घूमते वे लोग बेसमेंट में चले गए। नीचे जाने पर बरात गायब हो गई। उन 50-60 लोगों का आज तक पता नहीं चल सका। इसके बाद भी कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं के बाद किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया।
ये किला भूल-भुलैय्या की तरह है। अगर जानकारी न हो तो इसमें अधिक अंदर जाने पर कोई भी दिशा भूल हो सकता है। दिन में भी अंधेरा रहने के कारण दिन में भी ये किला डरावना लगता है।

किले में है खजाने का रहस्य-

खजाने को तलाशने के चक्कर में कईयों की जानें भी गई हैं। गढ़कुंडार का किला बेहद रहस्मयी है। कहा जाता है कि इसके बेसमेंट में कई रहस्य अभी भी मौजूद हैं। दो फ्लोर बेसमेंट को बंद कर दिया गया है। खजाने का रहस्य इसी में छिपा हुआ है।
इतिहासकार हरिगोविंद सिंह कुशवाहा बताते हैं कि गढ़कुंडार बेहद संपन्न और पुरानी रियासत रही है। यहां के राजाओं के पास कभी भी सोना, हीरे, जवाहरात की कमी नहीं रही। कई विदेशी ताकतों ने खजाने को लूटा। स्थानीय चोर उचक्कों ने भी खजाने को तलाशने के की कोशि‍श की।-
वो कहते हैं कि इस किले में इतना सोना चांदी है कि भारत जैसा देश भी अमीर हो जाए। यहां चंदेलों, बुंदेलों, खंगारों का कब्जा रहा। किले के नीचे दो मंजिला भवन है। इसी में खजाने का रहस्य है।

सुरक्षा की दृष्टि से बेजोड़ नमूना-

ये किला सुरक्षा की दृष्टि से बनवाया गया एक ऐसा बेजोड़ नमूना है, जो अब तक लोगों को भ्रमित कर देता है। किला एक ऊंची पहाड़ी पर एक हेक्टेयर से अधिक वर्गाकार जमीन पर बना हुआ है।-
किला इस तरह बनाया गया कि ये 4-5 किलोमीटर दूर से तो दिखता है, लेकिन नजदीक आते-आते किला दिखना बंद हो जाता है। जिस रास्ते से किला दूर से दिखता है। अगर उसी रास्ते से आएंगे तो ये रास्ता भी किले की बजाय कहीं और जाता है। जबकि किले के लिए दूसरा रास्ता है।
गढ़कुंडार को लेकर लेखक वृंदावनलाल वर्मा ने किताब भी लिखी है। इसमें किताब में भी गढ़कुंडार के कई रहस्य दर्ज किए हैं।

 

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